अल्मोड़ा: हिमालय का विकास संभव, सही शोध और सामुदायिक भागीदारी से: प्रो. बारिक

┈➤ 32वें पंडित गोविंद बल्लभ पंत स्मृति व्याख्यान में बोले नॉर्थ-ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी के कुलपति सीएनई रिपोर्टर, अल्मोड़ा: गोविन्द बल्लभ पन्त राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान में वार्षिक दिवस एवं 32वें पंडित गोविन्द बल्लभ पन्त स्मृति व्याख्यान का आयोजन हुआ। व्याख्यान के वक्ता नॉर्थ-ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी, शिलांग के कुलपति प्रो. सरोज कांता बारिक ने कहा कि […] The post अल्मोड़ा: बेहतर शोध व समुदाय की भागीदारी से हिमालय का विकास संभव: प्रो. बारिक appeared first on Creative News Express | CNE News.

अल्मोड़ा: हिमालय का विकास संभव, सही शोध और सामुदायिक भागीदारी से: प्रो. बारिक

अल्मोड़ा: हिमालय का विकास संभव, सही शोध और सामुदायिक भागीदारी से: प्रो. बारिक

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कम शब्दों में कहें तो, नॉर्थ-ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. सरोज कांता बारिक ने कहा कि हिमालय का विकास बेहतर शोध और समुदाय की भागीदारी से संभव है।

सीएनई रिपोर्टर, अल्मोड़ा: हाल ही में गोविन्द बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान में 32वें पंडित गोविंद बल्लभ पंत स्मृति व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस अवसर पर प्रो. बारिक ने यह महत्वपूर्ण बात सामने रखी कि हिमालय क्षेत्र में विकास के लिए शोध और स्थानीय समुदायों का योगदान अत्यंत आवश्यक है। उनकी शोधपरक कवायदों में हिमालय की पारिस्थितिकी और समाज की संस्कृति को समझने पर जोर दिया गया।

प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण

प्रो. बारिक ने कहा, "हिमालय क्षेत्र में पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना करने के लिए हमें न केवल वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना होगा, बल्कि स्थानीय लोगों को भी इस प्रक्रिया में शामिल करना होगा।" उन्होंने बताया कि सामुदायिक भागीदारी से न केवल संसाधनों का संरक्षण संभव है, बल्कि इससे स्थानीय संस्कृति और पारिस्थितिकी का भी संरक्षण होगा।

समुदाय के महत्व पर जोर

कुलपति ने इस बात पर जोर दिया कि "जब स्थानीय निवासियों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल किया जाता है, तो वह अपने पर्यावरण की रक्षा करने के लिए अधिक समर्पित होते हैं।" उन्होंने उदाहरण देते हुए कई समाजिक प्रयोगों की चर्चा की, जहाँ स्थानीय लोगों ने बिना सरकारी सहायता के अपने संसाधनों का सही तरीके से इस्तेमाल किया।

आवश्यकता है शोध की

अपने व्याख्यान में, प्रो. बारिक ने शोध को संघर्ष की कुंजी बताते हुए कहा कि वैज्ञानिक निष्कर्ष तब ही सार्थक होते हैं जब उन्हें स्थानीय परिस्थितियों में लागू किया जा सके। उन्होंने कई मौतल शोध परियोजनाओं की चर्चा की, जो हिमालयी क्षेत्र के विकास में सहायक सिद्ध हो सकती हैं।

निष्कर्ष

प्रो. बारिक का यह व्याख्यान हिमालय के विकास के लिए एक नई दिशा निर्देशित करता है। उनका यह विचार कि "हिमालय का विकास केवल शोध के माध्यम से नहीं, बल्कि सामुदायिक सहयोग से संभव है", निश्चित रूप से एक विकसित और समृद्ध हिमालय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

हमें उम्मीद है कि इस प्रकार के विचारशील व्याख्यान से स्थानीय समुदायों को जागरूक करने और अपने पर्यावरण के प्रति उत्तरदाई बनाने में मदद मिलेगी।

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सादर,

टीम धर्म युद्ध, सीमा शर्मा