अहंकार का नाश: भक्तवत्सल श्रीविष्णु की प्रेरक कहानी

*खिरका में आचार्य अवध किशोर शास्त्री ‘सरस’ जी की संगीतमय साप्ताहिक श्रीराम कथा के दूसरे दिवस के सायं सत्र में भी हुई आनंददायी भगवत्चर्चा* फ्रंट न्यूज नेटवर्क, फतेहगंज पश्चिमी-बरेली। नैमिषारण्य धाम से आए प्रसिद्ध कथाव्यास आचार्य अवध किशोर शास्त्री सरस’ ने समझाया-“श्रीहरि विष्णु अपने परम भक्तों के हृदय में अहंकार का अंकुर फूटते ही उसे […] The post अहंकार का अंकुर फूटते ही उखाड़ डालते हैं भक्तवत्सल श्रीविष्णु appeared first on Front News Network.

अहंकार का नाश: भक्तवत्सल श्रीविष्णु की प्रेरक कहानी

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कम शब्दों में कहें तो, खिरका में आयोजित आचार्य अवध किशोर शास्त्री ‘सरस’ जी की संगीतमय कथा में भक्तवत्सल श्रीविष्णु के अहंकार के प्रति दृष्टिकोण पर गहन चर्चा हुई।

फ्रंट न्यूज नेटवर्क, फतेहगंज पश्चिमी-बरेली। हाल ही में खिरका में आचार्य अवध किशोर शास्त्री ‘सरस’ जी ने साप्ताहिक श्रीराम कथा के दूसरे दिवस के सायं सत्र के दौरान एक प्रभावशाली व्याख्यान दिया। उन्होंने इस अवसर पर महाकवि की प्रेरक कथा को दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत किया और समझाया कि “श्रीहरि विष्णु अपने परम भक्तों के हृदय में अहंकार का अंकुर फूटते ही उसे जड़ से उखाड़ डालते हैं।”

आचार्य अवध किशोर शास्त्री

भगवती कथा का महत्व

कथाव्यास श्री ‘सरस’ जी ने पूरे उत्साह के साथ ग्राम खिरका जगतपुर में उपस्थित श्रधालुओं को अपने विचार प्रस्तुत किए। उनके अनुसार, “अहंकारी व्यक्ति गुरुजनों के चेताने पर भी अपनी आस्था को त्याग नहीं पाता और अंततः अपना विनाश कर बैठता है।” यह एक महत्वपूर्ण संदेश है कि आत्ममंथन और गुरु की विनम्रता का अवलंबन हमारे लिए कितना आवश्यक है।

श्रद्धालु

आचार्य जी ने कथा के माध्यम से यह भी बताया कि ईश्वर अपने भक्तों के भीतर अहंकार के अंकुर को कभी फलने नहीं देते। जब भी किसी भक्त का अहंकार उगता है, श्रीहरि उसे तुरंत नष्ट कर देते हैं, ताकि वह पुनः सही मार्ग पर जा सके।

देवर्षि नारद की कहानी

कथाव्यास ने बताते हुए कहा कि “कामदेव को भी जीतने का गर्व रखने वाले देवर्षि नारद भगवान की मोहमाया के प्रभाव में आकर श्री हरि से अपना ही स्वरूप मांग लेते हैं।” आश्चर्यजनक है कि कैसे भक्तों की इच्छा कभी-कभी उनके अहंकार का कारण बन जाती है।

देवर्षि नारद

नारद जी की आत्मा में समर्पण की भावना थी, और उन्होंने ईश्वर से यह प्रार्थना की कि “आपन रूप देहु प्रभु मोही। आन भांति नहिं पावौं ओही।” उनका यह संकल्प उनके महान भक्तवत्सल की कहानी को और भी प्रेरणादायक बनाता है।

आचार्य अवध किशोर शास्त्री

निष्कर्ष

कथाव्यास ने आगे बताया कि “विश्व मोहिनी का वरण कर रहे श्री नारायण को नारद जी ने अपशब्द कहकर शाप दिया लेकिन जब प्रभु की प्रेरणा से माया का आवरण दूर हुआ, तो वे खुद अपने कृत्यों पर पछताए।” यह घटना हमें यह सिखाती है कि हमें अपने कर्मों के प्रति सजग रहना चाहिए, और अहंकार से दूर रहना चाहिए।

श्रद्धालु कीर्तन

आरती और प्रसाद वितरण के बाद, पूरे गॉंव के श्रद्धालु इस कथा से गदगद होकर घर लौटे। मुख्य यजमान नत्थूलाल पुजेरी समेत कई अन्य प्रमुख व्यक्ति इस दृश्य का हिस्सा बने। भक्तवत्सल श्रीविष्णु की महिमा का गुणगान करते हुए श्रद्धालुओं ने पूरे समय भक्ति गीतों में लीन रहे।

भक्तों का यह जमावड़ा बताता है कि जब ईश्वर की महिमा का प्रकाश होता है, तब लोग अपने अहं का त्याग कर एक जुट होकर भक्ति में लीन हो जाते हैं।

इस कथा के माध्यम से हम समझ सकते हैं कि श्रीविष्णु अपने भक्तों की रक्षा के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं और जब भी अहंकार का अंकुर फूटता है, उसे तुरंत जड़ से उखाड़ देते हैं।

दोस्तों, आओ हम सभी इस सन्देश को आत्मसात करें और अपने जीवन में भी इसे लागू करें।
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