उत्तराखंड ईको टूरिज्म में 1.63 करोड़ की गड़बड़ी, सूचना आयोग ने मांगी विस्तृत जानकारी
उत्तराखंड राज्य सूचना आयोग ने पिथौरागढ़ जिले के मुनस्यारी में ईको हट्स और ईको टूरिज्म सुविधाओं के निर्माण में कथित अनियमितताओं के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए वन विभाग के लोक सूचना अधिकारी (PIO) को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि यदि जांच पूरी हो चुकी है तो सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत मांगी […] The post ईको टूरिज्म में 1.63 करोड़ की गड़बड़ी, सूचना आयोग ने मांगी पूरी जानकारी appeared first on The Lifeline Today : हिंदी न्यूज़ पोर्टल.
उत्तराखंड ईको टूरिज्म में 1.63 करोड़ की गड़बड़ी, सूचना आयोग ने मांगी विस्तृत जानकारी
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कम शब्दों में कहें तो, उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में मुनस्यारी में ईको टूरिज्म परियोजनाओं में 1.63 करोड़ रुपये की गड़बड़ी को लेकर राज्य सूचना आयोग ने वन विभाग से जानकारी की मांग की है।
उत्तराखंड राज्य सूचना आयोग ने हाल ही में पिथौरागढ़ जिले के मुनस्यारी में ईको हट्स और ईको टूरिज्म सुविधाओं के निर्माण में कथित अनियमितताओं के मामले में सख्त रुख अपनाया है। आयोग ने वन विभाग के लोक सूचना अधिकारी (PIO) को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि यदि जांच पूरी हो चुकी है, तो सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई सभी जानकारी 15 दिनों के भीतर आवेदक को उपलब्ध कराई जाए। यह मामला तब सामने आया जब वन विभाग की जांच में मुनस्यारी में ईको टूरिज्म परियोजना के अंतर्गत लगभग 1.63 करोड़ रुपये की गड़बड़ी का भंडाफोड़ हुआ था।
जांच की पृष्ठभूमि
इस गड़बड़ी के आरोप तत्कालीन डीएफओ और आईएफएस अधिकारी विनय भार्गव के कार्यकाल से जुड़े हैं। गौर करने वाली बात यह है कि हरिंदर धींगरा नाम के एक आवेदक ने आरटीआई आवेदन के माध्यम से विनय भार्गव के खिलाफ की गई समस्त विभागीय कार्रवाई, जांच रिपोर्ट और संबंधित दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां मांगी थीं। यह मामला ईको टूरिज्म परियोजनाओं की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर उठ रहे सवालों को और बढ़ा रहा है।
आयोग के निर्देश
राज्य सूचना आयोग ने सुनवाई के दौरान संबंधित लोक सूचना अधिकारी को निर्देशित किया कि:
- यदि मामले की जांच पूरी हो चुकी है, तो उसकी पूरी रिपोर्ट और कार्रवाई का ब्यौरा 15 दिनों के भीतर उपलब्ध कराया जाए।
- यदि जांच अभी लंबित है, तो उसके पूर्ण होते ही 15 दिनों के भीतर समस्त जानकारी आवेदक को दी जाए।
प्रमुख सचिव वन को भेजा गया पत्र
इस मामले में प्रमुख सचिव (वन) को पत्र भेजकर विस्तृत जांच रिपोर्ट और दोषियों के खिलाफ की गई कार्रवाई की जानकारी भी मांगी गई थी। राज्य सूचना आयोग के निर्देश के बाद, वन विभाग पर पारदर्शिता सुनिश्चित करने का दबाव बढ़ गया है। इसके साथ ही यह आदेश यह संकेत देता है कि सार्वजनिक धन से संचालित परियोजनाओं में पारदर्शिता अनिवार्य है और सूचना देने में अनावश्यक देरी स्वीकार नहीं की जाएगी।
समाज की प्रतिक्रिया
अब सबकी निगाहें वन विभाग पर टिकी हुई हैं कि क्या वह निर्धारित समयसीमा में जांच रिपोर्ट और कार्रवाई का पूरा विवरण सार्वजनिक करता है या नहीं। यह मामला न केवल वन विभाग बल्कि ईको टूरिज्म परियोजनाओं की निगरानी और जवाबदेही पर भी सवाल खड़े कर रहा है।
इस प्रकरण पर विभिन्न सामाजिक संगठनों और नागरिकों ने अपनी चिंता व्यक्त की है और पारदर्शिता की अपेक्षा की है। यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि ईको टूरिज्म केवल पर्यावरण संरक्षण का साधन नहीं है, बल्कि यह स्थानिय लोगों के लिए जीवनयापन का भी साधन है। इस प्रकार की अनियमितताएं उनके भविष्य को प्रभावित करने वाली हो सकती हैं।
इस स्थिति के मद्देनजर, पर्यावरण के प्रति सजग नागरिकों की जिम्मेदारी है कि वे अपने अधिकारों के प्रति अवगत रहें और पारदर्शिता की मांग करें। ईको टूरिज्म में इस तरह के मामलों से ना केवल पर्यावरण का नुकसान होता है, बल्कि यह समाज के आर्थिक संतुलन को भी विषम बना सकता है।
अतः, उम्मीद की जानी चाहिए कि राज्य सूचना आयोग के निर्देशों का पालन किया जाएगा और जांच प्रक्रिया में कोई भी देरी नहीं होगी। इससे सिर्फ वन विभाग नहीं, बल्कि सभी सरकारी संस्थाओं के लिए एक उदाहरण बनेगा, जो भविष्य में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करे।
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सादर,
ऋतु कुमारी
टीम धर्म युद्ध