वीर चंद्र सिंह गढ़वाली स्मृति मेले में जनसैलाब, कोदियाबगड़ में दी गई श्रद्धांजलि

गैरसैंण। पेशावर कांड के महानायक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और सामाजिक चेतना के प्रतीक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की स्मृति में आयोजित वार्षिक मेला इस वर्ष भी उनकी समाधि स्थल कोदियाबगड़ (दूधातोली) में श्रद्धा और उत्साह के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर चमोली, पौड़ी और अल्मोड़ा जिलों के सीमांत क्षेत्रों से बड़ी संख्या में ग्रामीणों […]

वीर चंद्र सिंह गढ़वाली स्मृति मेले में जनसैलाब, कोदियाबगड़ में दी गई श्रद्धांजलि
गैरसैंण। पेशावर कांड के महानायक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और सामाजिक चेतना के प्रतीक वीर चंद्र

वीर चंद्र सिंह गढ़वाली स्मृति मेले में जनसैलाब, कोदियाबगड़ में दी गई श्रद्धांजलि

गैरसैंण।

कम शब्दों में कहें तो, पेशावर कांड के महानायक और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की स्मृति में आयोजित वार्षिक मेला इस वर्ष भी उनके समाधि स्थल कोदियाबगड़ (दूधातोली) में धूमधाम से संपन्न हुआ। इस अवसर पर चमोली, पौड़ी और अल्मोड़ा जिलों के सीमांत क्षेत्रों से बड़ी संख्या में ग्रामीण अद्भुत श्रद्धा और उत्साह के साथ शामिल हुए और वीर सेनानी को श्रद्धांजलि अर्पित की।

कोदियाबगड़: वीरता का प्रतीक

कोदियाबगड़, जो समुद्र तल से लगभग 3100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, उत्तराखंड के 'पामीर' के रूप में प्रसिद्ध है। यह स्थल वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की अंतिम इच्छा से जुड़ा हुआ है, जहां उनकी समाधि स्थापित की गई है। इस स्थान पर हर साल 12 जून को मेला आयोजित किया जाता है, जो उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करने का अवसर प्रदान करता है।

Veer Chandra Singh Garhwali Memorial Fair

Veer Chandra Singh Garhwali Memorial Fair

नवीन प्रतिमा का अनावरण एवं सांस्कृतिक आयोजन

इस वर्ष मेले का मुख्य आकर्षण समाधि स्थल पर स्थापित नई प्रतिमा का अनावरण था। गैरसैंण नगर पंचायत अध्यक्ष मोहन भंडारी की अध्यक्षता में आयोजित कार्यक्रम में स्थानीय ग्रामीणों ने वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की नवीन प्रतिमा का अनावरण किया और तिरंगा ध्वज फहराकर उन्हें नमन किया। इसके साथ ही, विभिन्न महिला मंगल दलों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम भी प्रस्तुत किए गए, जो लोक संस्कृति की समृद्धि को दर्शाते हैं।

वीरता और सामाजिक प्रेरणा का प्रतीक

नगर पंचायत अध्यक्ष मोहन भंडारी ने इस अवसर पर कहा कि वीर चंद्र सिंह गढ़वाली का जीवन एक अद्भुत साहस, देशभक्ति और सामाजिक सेवा का अद्वितीय उदाहरण है। उन्होंने अन्याय और दमन के विरुद्ध खड़े होकर मानवता और राष्ट्रहित की मिसाल पेश की। उनके आदर्शों को नई पीढ़ी तक पहुंचाना हम सभी की जिम्मेदारी है और स्मृति मेला इसी उद्देश्य को आगे बढ़ाने का माध्यम है।

ऐतिहासिक संघर्ष की गाथा

गौरतलब है कि 23 अप्रैल 1930 को पेशावर में ब्रिटिश सरकार द्वारा निहत्थे स्वतंत्रता सेनानियों पर गोली चलाने का आदेश दिए जाने पर हवलदार मेजर चंद्र सिंह गढ़वाली ने अपने साथियों के साथ गोली चलाने से इनकार कर दिया था। यह साहसिक निर्णय उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन के अमर नायकों में शामिल करता है। बाद में, 12 जून 1930 को एबटाबाद मिलिट्री कोर्ट ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी और उनकी संपत्ति भी जब्त कर ली गई थी।

करीब 11 वर्षों तक विभिन्न जेलों में कारावास झेलने के बाद उन्हें 26 सितंबर 1941 को रिहा किया गया। स्वतंत्रता के बाद भी, उन्होंने समाज सेवा और जनहित के कार्यों में संलग्नता दिखाई। वर्ष 1979 में, अपने निधन से पहले, उन्होंने कोदियाबगड़ में अपनी समाधि बनाए जाने की इच्छा व्यक्त की थी।

पारंपरिक मेले की संस्कृति

दूधातोली क्षेत्र में सदियों से पशुपालकों द्वारा आयोजित इस मेले की परंपरा आज भी जिंदा है। हालांकि बदलते समय और पशुपालन में कमी के कारण मेले की रौनक कुछ कम हो गई थी, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में स्थानीय लोगों और नगर पंचायत के प्रयासों से इसकी पहचान लौटाने का कार्य हो रहा है।

स्थानीय लोग मानते हैं कि वीर चंद्र सिंह गढ़वाली केवल एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं, बल्कि उत्तराखंड की अस्मिता, साहस और जनसेवा के प्रतीक हैं। उनकी स्मृति में आयोजित यह मेला आने वाली पीढ़ियों को उनके संघर्ष और बलिदान की प्रेरणा देता रहेगा।

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टीम धर्म युद्ध